Wednesday, September 21, 2011

my books ..

मेरी किताबें (डा. जेएसबी नायडू) -
1. मैं सोच रहा था / काव्य संकलन / 2005
2. विश्वरंजन / व्यक्तित्व-शब्द-चित्रण / 2009
3. दुखहर्ता-सुखकर्ता / श्री गणेश के 32 स्वरूपों का वर्णन .. रेखांकनो के साथ व हिन्दी, अंग्रेजी और संस्कृत में / लेखक द्वय – डा सुभाष अत्रे व डा. जेएसबी नायडू / 2010

Sunday, August 21, 2011

यह सही है कि सोचने से क्या होता है कि यह गलत है या फिर यह सही .. यह तो सब वक्त-वक्त की बात है .. यह सही है कि सोच पर किसी की सहमति सौभाग्य है .. और लेकिन यदि असहमति हो तो भी भला निराश क्यों होना .. क्योंकि यदि सोच में सचाई है तो आज नहीं तो कल वह अवश्य मान्य होगा .. लेकिन फिर भी यदि किसी की असहमति है तो उससे क्या कोई अभिव्यक्त करना छोड़ दे .. आवश्यकता इस बात की है कि सोच को अभिव्यक्त करना ही चाहिये .. यह सोच किसी को पसंद आ सकती है तो किसी को नहीं भी .. प्रकृति में अनेक रंग हैं किसी को अमुक रंग पसंद है तो किसी को अमुक .. सभी को एक ही रंग पसंद हो .. यह जरूरी तो नहीं ..
महत्वपूर्ण तो यह है कि आप कई लोगों को अपनी सोच की सकारात्मकता का लाभ देते हैं। आवश्यकता तो सोच को बदलने की है .. चिंतन की है। सोच को बदलने की दिशा में प्रयास स्वस्फूर्त होना चाहिये .. जोर-जबरदस्ती या बेमन से नहीं। अपनी बात को मनवाने के लिये आपको व्यापक संदर्भों में चिंतन करना होगा। एक दिन में कईयों की सोच को बदला नहीं जा सकता। सभी कुछ प्राकृतिक है .. बरसात फिर ठंड और गर्मी के बाद फिर से बरसात .. ये सभी स्थितियां अचानक और एक दिन में नहीं बदला करती। प्रकृति के नियमों को अनदेखा करके सोचना सार्थक प्रयास नहीं हो सकता। मीठा अच्छा लगता है लेकिन अत्यधिक मीठा खा लेने से मिठाई के लिये विरक्ति भाव पैदा हो जाता है। थोड़ा इंतजार करना जरूरी है। प्रकृति का नियम भी यही कहता है। जो कुछ भी घट रहा है वह सभी कुछ प्राकृतिक है और नया तो कुछ भी नहीं है। कहीं सूखा तो कहीं है - बाढ़ की त्रासदी .. यह तो प्रकृति का नियम है ..। फिर सही क्या है और गलत क्या है इसकी विवेचना करने से तो ज्यादा अच्छा है कि चिंतन करें कि कैसे कहीं सूखा और कैसे कहीं अतिवृष्टि पड़ने पर राहत का प्रयास करें। आप न तो अतिवृष्टि को रोक सकते हैं और न हीं आप सूखा को .. इस बात को भूलना कभी भी उचित नहीं होगा ..

Saturday, August 20, 2011

मैं सोच रहा था ..

यादें ..
आपसे कोई नहीं छीन नहीं सकता ..
सिवाय प्रकृति के ..
मैं सोच रहा था ..

Monday, August 8, 2011

मैं सोच रहा था ..

कुछ भी लिखने से तो अच्छा है कि जब लगे कि कुछ अच्छा है तो उसे लिख दिया .. मगर एक नहीं कई बार लगा है कि जिसे मैं यूं ही समझता रहा वह परिणाम स्वरुप अत्यंत प्रभावशाली अभिव्यक्ति रही .. अर्थात् जरूरी नहीं कि जिसे आप महत्वपूर्ण समझ रहे हों वह हर किसी को वैसा ही लगे .. मत भिन्नता .. इसी को तो कहते हैं .. लेकिन यह वाकिफ होते हुए भी कि मत भिन्नता होती है .. सभी-कुछ जैसे अपरिहार्य़ हो जाता है .. कभी-कभी .. मैं सोच रहा था ..

Monday, July 4, 2011

मैं सोच रहा था ..

मैं उपर वाले का तहे दिल से .. प्रत्येक पल के लिये .. शुक्रिया इसलिये अदा करना चाहता हूं कि उसने अभी तलक ऐसा कोई तरकीब किसी इंसान के दिमाग में नहीं दी कि कोई दूसरा यह जान सके कि मैं किसी के बारे में क्या सोच रहा हूं .. इसलिये तो मैं कहता हूं कि .. मुझे तो किसी भी आत्म कथा में पूर्णता नहीं दिखलाई पड़ती .. और ऐसा कहने के लिये .. मैं उनसे क्षमा मांगता हूं .. उनसे .. जो दावा करते हैं कि वे साफ-साफ दिल की सचाई लिख देने के हिमायती हैं ..

मैं सोच रहा था ..

(1) जब आप कुछ लिखें और फिर कुछ दिनो बाद .. जब अपने ही लिखे को .. फिर से पढ़ें और तब .. यदि आपको लगे कि उसमे किसी भी सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है .. तब समझो कि चिंतन की दिशा व अभिव्यक्ति सही है .. मैं सोच रहा था ..
(2) Mistake एक शब्द है और relations एक dictionary .. एक शब्द के लिये पूरी की पूरी dictionary कोई कैसे छोड़ सकता है .. मैं सोच रहा था ..